जिस घड़ी तेरे दिल से उतर जाएँगे….

जिस घड़ी तेरे दिल से उतर जाएँगे!
जीते जी ही सनम हम तो मर जाएँगे!

गर न चाहत का तेरी सहारा मिला!
ग़म के मारे बता हम किधर जाएँगे!

पास उल्फ़त का रक्खेंगे हर हाल में!
तुम जो दोगे सदा हम ठहर जाएँगे!

हम तो दीवाने हैं देखना एक दिन!
मिस्ल-ए-ख़ूश्बू फ़ज़ा में बिखर जाएँगे!

हो रफ़ीक़-ए-सफ़र तुम अगर फिर तो हम!
राह-ए-पुरख़ार से भी गुज़र जाएँगे!

तुम तराशोगे गर नाज़-ओ-अंदाज़ से!
देखना एक दिन हम सँवर जाएँगे!

राह-ए-उल्फ़त में शबनम तुम्हें जो मिले!
वक़्त के साथ वो ज़ख़्म भर जाएँगे!
– ख़ान शबनम सुल्ताना

सारा आलम ही चमकदार नज़र आता है……

सारा आलम ही चमकदार नज़र आता है
तेरी चाहत का तलबगार नज़र आता है

बे’हिजाबाना वो गुज़रे हैं इधर से शायद
जिसको देखो वही मयख़्वार नज़र आता है

मुंफइल होता नहीं है वो ख़ता पर अपनी
उसके अख़्लाक़ में पिंदार नज़र आता है

जब भी अंगड़ाइयां लेता है गुलों का मौसम
तेरी बाँहों का मुझे हार नज़र आता है

उसने भेजा तो नहीं मुझको मुहब्बत नामा
उसकी आँखों में पर इज़हार नज़र आता है

कोई सिद्दीक़-ओ-उमर उसमाँ
अली के जैसा
अब कहाँ साहिब-ए-किरदार नज़र आता है

लेके जाऊँ मैं कहाँ अपनी वफ़ाएँ शबनम
जिस तरफ़ देखिये बाज़ार नज़र आता है,,,,
– ख़ान शबनम सुल्ताना

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